जाति पाँती की लड़ाई की आड़ में मानवीय मुल्यों की तिलाँजलि : तर्पण

tarpnजाति पाँती की लड़ाई की आड़ में मानवीय मुल्यों की तिलाँजलि : तर्पण

बैनर :           एमिनेंस स्टुडिओज़ प्रस्तुति और मिमेसिस मीडिया

स्टारकास्ट : नंद किशोर पंत, नीलम, पूनम इंगले, अभिषेक मदरेचा, संजय सोनू, राहुल चौहान

निर्देशक : नीलम आर सिंह 

अवधि : १०६ मिनट

सेंसर : U / A

रेटिंग :(4/5)

हिंदी फ़िल्मों और साहित्य का साथ हमेशा रहा है फिल्म मेकर्स की नयी कहानी की तलाश अक्सर साहित्य पर ठहरती है। उत्तर प्रदेश के चर्चित लेख़क शिवमूर्ति की कहानी तर्पण पर निर्माता और निर्देशक नीलम आर सिंह भी जाति पाति पर आधारित फ़िल्म तर्पण के लिए एक प्रभावशाली कथानक तैयार करने में सफल रहती है।

उत्तर प्रदेश के गाँव में छोटी जाति और बड़ी जाति की रसूल सबको पता है। गाँव की छोटी जाति की युवती राजपतिया गाँव ऊँची जाति के पंडित धर्मदत्त के खेतों में गन्ना लेने जाती है अपने खेत में राजपतिया को देखकर पंडित धर्मदत्त का लड़का चन्दर उसे पकड़कर प्रताड़ित करता है शोर मचाने के बाद गाँव वाले इकठ्ठा हो जाते है और चन्दर वहॉँ से भाग जाता है

अपनी बिटिया के साथ बुरे बर्ताव की शिक़ायत करने प्यारे पंडित के घर पहुँचता है जहाँ पर यह घटना बड़ी जाती का द्वारा छोटी जाति को प्रताड़ना का मुद्दा बन जाती है इस बीच भीम पार्टी के नेता भाईजी इस पूरी घटना का फ़ायदा उठाते हुवे प्यारे को पुलिस में जाकर चन्दर के खिलाफ़ आपराधिक केस दर्ज करता है। चन्दर को पुलिस ले जाती है और कोर्ट की पहली सुनवाई में जज उसे बेल देने से मना कर देता है। छोटी जाती के लिए जज का यह फ़ैसला एक बड़ी ख़ुशख़बरी की तरह है। राजपरिता का भाई मुनवा जोकि पंजाब के नौकरी छोड़कर इस मुद्दे में रूचि लेने लगता है। छोटी जाती के मुहल्ले में जश्न मनाया जाता है नौटंकी का आयोजन किया जाता है ।

दूसरी तरह अब यह मुद्दा बड़ी जाति के लिए सम्मान की बात बन जाती है चन्दर के मामा अमरकांत बड़े वकील के साथ चतुराई से चन्दर के बेल के लिए प्रयास कर रहे है सभी बड़े रसूलवाले इकट्ठे होते है और चन्दर को बेल मिल जाती है। जेल से बहार आने के बाद चन्दर प्रतिशोध लेना चाह रहा है। राजपतिया के पिता प्यारे ने अपने लड़की को बड़ी छोटी जाति की लड़ाई में एक हथियार बना लिया है। तो भीम पार्टी के नेता भाईजी इस पूरी घटना में अपनी राजनैतिक रोटी सेंकना चाहता है। फ़िल्म का अंत बेहद ही अप्रत्याशित है जो आपको सोचने पर विवश कर देगा

अभिनय की दृष्टि से फिल्म के सभी कलाकारों ने बहुत ही स्वाभाविक क़िरदार निभाया है फ़िल्म में राजपतिया के पिता के क़िरदार में नन्द किशोर के किरदार में विविधता है। छोटी जाति से होने के कारण बड़ी जाति के लोगो के प्रति पीढ़ियों का रोष उनके चहरे पर दिखाई देता है अपनी बेटी के साथ हुवे व्यवहार को एक हथियार बनाकर इस रोष के जरिये बदले की भाव चेहरे स्पष्ट आता है राजपतिया के माँ के किरदार में पूनम इंगले , भाईजी संजय कुमार , चन्दर के मामा के किरदार अमरकांत में अरुण शेखर , पंडित धर्मदत्त राहुल चौहान , पंडिताइन वंदना अस्थाना , चन्दर के किरदार में अभिशेख मदरेचा का अभिनय बेहद ही स्वाभाविक है। फिल्म के सभी कलाकारों ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है।

बतौर निर्देशक नीलम आर सिंह अपनी पहली फ़िल्म में एक बेहद ही जिम्मदार निर्देशन का परिचय दिया है फ़िल्म के सभी क़िरदारों को परदे पर जीवंत कर दिया है। बिना किसी बड़े चेहरे की उपस्थिति में उन्होंने ग्रामीण परिवेश की इस कहानी को ज़ोरदार तरीक़े से कही है। एक संवेदनशील विषय के साथ उन्होंने न्याय किया है साथ ही स्त्री सम्मान जैसे मुद्दे पर समाज के दोहरे मापदंड को भी दिखाया है। नीलम आर सिंह समाज़ की दोहरी मानसिकता को परदे पर उकेरती है।

फ़िल्म में प्रमुख भूमिकाओं में नन्द किशोर पंत, संजय सोनू, राहुल चौहान, अभिषेक मदरेचा, पूनम इंगले, नीलम, वंदना अस्थाना, अरुण शेखर , पद्मजा रॉय निभाई है । यह फ़िल्म लेख़क शिवमूर्ति जी की नॉवेल पर आधारित है, स्क्रीनप्ले और संवाद धर्मेंद्र वी सिंह ने लिखे हैं। गीतकार राकेश निराला के लिखे गीतों को मनोज नयन ने संगीतबद्ध किया है।सुकुमार जटानिया सिनेमैटोग्राफ़र हैं और सुनील यादव ने संपादन किया है। फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर संजय पाठक ने तैयार किया है।




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