मूवी रिव्यू मंटो

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मूवी रिव्यू :                मंटो 

कलाकार :                नवाजुद्दीन सिद्दीकी,रसिका दुग्गल,ताहिर राज भसीन,इला अरुण

निर्देशक :                  नंदिता दास

रेटिंग :                     स्टार (3/5)

फिल्म समीक्षा  :       अमित बच्चन

उर्दू के कवि और लेखक सआदत हसन मंटो पर बानी बायोपिक फिल्म “मंटो“ बेहद दिलचस्प और दिल को छू जाने वाली कहानी है। जो 1946 के बॉम्बे से शुरू होती है, फिल्म की शुरुआत ही दर्शक को बेचैन कर देती है झोपड़पट्टी में रहनेवाली एक जवान लड़की को उसका बाप दो पुरुषों को बेच देता है। वे उसे बीच पर ले जाते हैं। वहां अपने भोलेपन में उनके और उनके ड्राइवर के साथ खेलती है। उसके बाद उसके साथ दुष्कर्म किया जाता है।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी के एक्टिंग देखने वाला दांतों तले उंगलियां दबा लेता है। मंटो के व्यक्तित्व को सिद्दीकी ने पर्दे पर एकदम से जिंदा कर दिया है। मंटो अपनी पत्नी सफिया और बेटी निधि के साथ रहता है, मंटो का प्रोड्यूसर और फिल्म इंडस्ट्री के दोस्तों के साथ कुछ ना कुछ अनबन होता रहता है.

मंटो की अलग अलग कहानी दिखाई गयी है। एक कहानी में एक इनसान एक थकी- मांदी सेक्स वर्कर को बेड से खींचता है। वह गिड़गिड़ाती है और सोने की इजाजत मांगती है। लेकिन वह बुरी तरह पीटी जाती है। हाथापाई में आदमी के सिर पर मरती है और उसकी मौत हो जाती है।

मंटो को एक मुकदमे में निर्दोष साबित किया गया है। एक कैफे में वे नजदीकी दोस्तों और पत्नी के साथ जश्न मनाते हैं। उनके बालीवुड दोस्तों में प्रसिद्ध अभिनेता अशोक कुमार और श्याम चड्ढा शामिल हैं। एक दिन मंटो हिंदू श्याम के साथ कार में हैं। अचानक उनकी मुठभेड़ एक मुस्लिम भीड़ से होती है। मंटो आतंकित हो जाते हैं। लेकिन जैसे ही भीड़ एक्टर को पहचान लेती है, वे मस्ती में झूमने लगते हैं। भूल जाते हैं कि वह किस धर्म के हैं।

मंटो के शब्द हैं या तो हर किसी की जिंदगी मायने रखती है, या किसी की नहीं। लेकिन पागलपन की हिंसा के बीच आदर्श की बात करना बेकार है। विभाजन के बाद की हिंसा में 1948 में लाहौर बरबाद हो चुका है। मंटो अपनी पत्नी और नन्हीं बेटियों की देखभाल के लिए संघर्ष कर रहे हैं। रचना के साथ समझौता करना पड़ता है। शराब में खुद को डुबो लेते हैं। उन्हें गिरफ्तार किया जाता है। वे कोर्ट में अपना बचाव करते हैं। वे अपनी स्पीच में कहते हैं कि कैसे एक लेखक को वास्तविकता का बयान करना जरूरी है।

एक स्मरणीय सीन में मंटो एक बड़े साहित्यिक क्लब में भड़काऊ टिप्पणी करते हैं और फिर तीन कहानियां पढ़ने का वादा करते हैं। हर एक कहानी चंद लाइनों की निकलती हैं, लेकिन शानदार! एक स्टोरी अंग्रेजी सबटाइटल में शायद गलती की वजह से खो जाती है। इसमें एक मुस्लिम चाकू से अपने शिकार को सीने से नीचे चीरता है,लेकिन आखिरकार पाता है कि शिकार खतनाधारी है, यानी उसकी तरह ही एक मुस्लिम है। सबटाइटल ऐसा दर्शाता है की उसका आश्चर्य का भाव की मुझसे गलती हो गयी।

अंतिम दृश्यों में सिद्दीकी एक भारतीय मार्सेलो मास्ट्रोइयानी की गड्ढेदार ठुड्डी लहराते हैं और ढीठ नजरों से देखते हैं। मंटो जब शराब की लत में बरबाद हो रहे होते हैं, वे तब भी जड़ कर देते हैं। एक चिंतित दोस्त से कहते हैं कि लोग शराब या तो दर्द को झेलने के लिए पीते हैं या होश खोने के लिए।  कहानी में बहुत कुछ ट्विस्ट हैं जिन्हे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

कैमरामैन कार्तिक विजय का जादू हर सीन में नजर आता है। रीता घोष ने ओल्ड कलकत्ता और बांबे का स्तंभित करनेवाला सेट बनाया है। फिर खूनखराबे के बरबाद लाहौर को रास्ता देता है। नाटकीय लघु कथाओं को पर्दे पर जीवंत कर दिया है अपनी पूरी विद्रूपता के साथ।

 




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